कुरान की आयत

یٰۤاَیُّهَا الَّذِیْنَ اٰمَنُوْا لَا تَاْكُلُوْۤا اَمْوَالَكُمْ بَیْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ اِلَّاۤ اَنْ تَكُوْنَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِّنْكُمْ وَ لَا تَقْتُلُوْۤا اَنْفُسَكُمْ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِكُمْ رَحِیْمًا(۲۹)(سورۃ النساء)
अनुवाद
ऐ ईमान वालो ! आपस में एक दूसरे के माल नाहक़ तरीक़े से न खाओ, इल्ला यह कि कोई तिजारत बाहमी रज़ामंदी से वजूद में आई हो (तो वह जाइज़ है) और अपने आप को क़त्ल न करो। यक़ीन जानो अल्लाह तुम पर बहुत मेहरबान है।(२९)(सूरह अन-निसा) यानी: इसका सादा मतलब तो यह है कि जिस तरह दूसरे का माल नाहक़ तरीक़े से खाना हराम है किसी की जान लेना उससे ज़्यादा हराम है, दूसरे की जान लेने को अपने आप को क़त्ल करने से ताबीर कर के इस तरफ़ भी इशारा हो गया कि दूसरे को क़त्ल करना बिलआख़िर अपने आप ही को क़त्ल करना है ; क्योंकि इसके बदले में ख़ुद क़ातिल क़त्ल हो सकता है, और अगर यहाँ क़त्ल न भी हो तो आख़िरत में इसकी जो सज़ा मिलनी है वह मौत से भी बदतर होगी, इस तरह इस ताबीर से ख़ुदकुशी की ममानअत भी वाज़ेह हो गई, दूसरे किसी का माल नाहक़ खाने के साथ यह जुमला लाने से इस तरफ़ भी इशारा मुमकिन है कि जब नाहक़ माल खाने का रिवाज मुआशरे में आम हो जाए तो इसका नतीजा इज्तिमाई ख़ुदकुशी की सूरत में निकलता है।(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)
लेख

पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)

शेख़-उल-हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब (दामत बरकातुहुम) अपनी मशहूर तस्नीफ़ "उलूम-उल-क़ुरआन" में लिखते हैं: "यह पांच तफ़सीरें (यानी तफ़सीर-ए-कबीर, तफ़सीर इब्न कसीर, तफ़सीर-ए-क़ुर्तुबी, तफ़सीर रूह-उल-मआनी और तफ़सीर-ए-कश्शाफ़) अहक़र (इस नाचीज़) के मामूली ज़ौक़ के मुताबिक ऐसी हैं कि अगर...

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