हक़ीक़त यह है कि इनमें से अक्सर लोगों के बारे में बात पूरी हो चुकी है। इसलिए वह ईमान नहीं लाते।(७)(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
यानी: मतलब यह है कि इन लोगों के बारे में तक़दीर में जो बात लिखी थी कि यह ईमान नहीं लाएँगे, वह बात पूरी हो रही है ; लेकिन यह वाज़ेह रहे कि तक़दीर में लिखा होने से यह लाज़िम नहीं आता कि वह कुफ़्र पर मजबूर हो गए हैं, क्योंकि तक़दीर में यह लिखा है कि अल्लाह तआला उनको ईमान लाने का मौक़ा भी देगा और इख़्तियार भी देगा ; लेकिन यह लोग अपने इख़्तियार और अपनी ख़ुशी से ज़िद पर अड़े रहेंगे और ईमान नहीं लाएँगे।(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
मोहतरम शैख-उल-इस्लाम मुफ्ती मोहम्मद तकी उस्मानी साहब से सवाल किया गया कि, "हज़रत, जिंदगी का सारांश (خلاصہ) क्या है?"
हज़रत ने ये 20 नुक्ते (निकात) इर्शाद फरमाए:
(1) हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा किया करो।
(2) कोशिश करो कि पूरी जिंदगी में कोई तुम्हारी शिकायत किसी दूसरे इंसान से न करे; परवरदिगार...