وَ مَا كُنْتُمْ تَسْتَتِرُوْنَ اَنْ یَّشْهَدَ عَلَیْكُمْ سَمْعُكُمْ وَ لَاۤ اَبْصَارُكُمْ وَ لَا جُلُوْدُكُمْ وَ لٰكِنْ ظَنَنْتُمْ اَنَّ اللّٰهَ لَا یَعْلَمُ كَثِیْرًا مِّمَّا تَعْمَلُوْنَ(۲۲)(سورۃ حم السجدہ)
अनुवाद
और तुम (गुनाह करते वक़्त) इस बात से तो छुप ही नहीं सकते थे कि तुम्हारे कान, तुम्हारी आँखें और तुम्हारी खालें तुम्हारे ख़िलाफ़ गवाही दें, लेकिन तुम्हारा गुमान यह था कि अल्लाह को तुम्हारे बहुत से आमाल का इल्म नहीं है।(२२)(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
यानी: सहीह बुख़ारी की एक हदीस में है कि बाज़ अहमक़ काफ़िर यह समझते थे कि अगर वह कोई गुनाह छुप कर करेंगे तो अल्लाह तआला को उसका इल्म नहीं होगा, उस वक़्त वह यह समझते थे कि हमारे गुनाह का न कोई गवाह है, और न (मुआज़अल्लाह) अल्लाह तआला को उसका पता चलेगा। उनके वहम व गुमान में भी यह बात नहीं होगी कि अल्लाह तआला तो हर बात का गवाह है ही, ख़ुद उनके जिस्म के यह आज़ा भी उनके ख़िलाफ़ गवाह बन जाएँगे।(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)