और जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसको कान लगाकर सुनो, और ख़ामोश रहो ताकि तुम पर रहमत हो। (२०४)(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
यानी : इस आयत ने बता दिया कि जब क़ुरआन करीम की तिलावत हो रही हो तो उसे सुनने का एहतिमाम करना चाहिए। अलबत्ता तिलावत करने वाले के लिए भी ज़रूरी है कि वह ऐसे मक़ामात पर बुलंद आवाज़ से तिलावत न करे जहाँ लोग अपने कामों में मश्ग़ूल हों। ऐसी सूरत में अगर लोग तिलावत की तरफ़ ध्यान नहीं देंगे तो इसका गुनाह तिलावत करने वाले को होगा।(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के दरबार (अदालत) में एक बाप ने अपने बेटे पर दावा (मुक़दमा) किया कि यह मेरे हुक़ूक़ (अधिकार) अदा नहीं करता! हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने लड़के से दरयाफ़्त (पूछताछ) किया, तो उसने कहा, "ऐ अमीरुल मोमिनीन! क्या बाप ही का सारा हक़ औलाद पर है या औलाद का भी बाप पर कुछ हक़ ह...