और जो शख़्स दुनिया में अंधा बना रहा، वह आख़िरत में भी अंधा، बल्कि रास्ते से और ज़्यादा भटका हुआ रहे।(७२)(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
यानी: यहाँ अंधा होने से मुराद यह है कि वह दुनिया में हक़ को देखने से महरूम रहा، चुनाँचे वह आख़िरत में भी नजात का रास्ता नहीं देख सकेगा।(आसान तर्जुमा-तुल-क़ुरआन)
दफ़्तर के करीब फ़ुटपाथ पर बैठे उस बूढ़े से आते-जाते जूते पॉलिश करवाना उसका नियम था। मगर एक अजीब बात जो मैं पिछले कई दिनों से नोट कर रहा था, वह यह थी कि वह हर बार जूता पॉलिश करवाने के बाद उस बुजुर्ग से उलझता कि "पॉलिश ठीक नहीं की, इसलिए दोबारा करो।" और हैरानी की बात यह कि दोबारा पॉलिश करवाने का मुआवज...