कुरान की आयत

اَیَحْسَبُ الْاِنْسَانُ اَلَّنْ نَّجْمَعَ عِظَامَهٗؕ(۳)بَلٰى قٰدِرِیْنَ عَلٰۤى اَنْ نُّسَوِّیَ بَنَانَهٗ(۴)(سورۃ القیامہ)
अनुवाद
क्या इंसान यह समझ रहा है कि हम उसकी हड्डियों को इकट्ठा नहीं कर सकेंगे? (3) क्यों नहीं? जबकि हमें इस पर भी क़ुदरत है कि उसकी उंगलियों के पोर-पोर को ठीक-ठीक बना दें। (4) (आसान तर्जुमा क़ुरआन) वज़ाहत: फ़रमाया जा रहा है: कि हड्डियों को जमा कर लेना तो बहुत मामूली बात है, अल्लाह तआला तो इंसान की उंगलियों के एक-एक पोरे दोबारा ठीक-ठीक उसी तरह दोबारा बनाने पर क़ादिर हैं, जैसे वह शुरू में थे। उंगलियों के पोरे का ख़ास तौर पर इसलिए ज़िक्र फ़रमाया गया है कि इन पोरों में जो बारीक-बारीक लकीरें होती हैं, वह हर इंसान की दूसरे से अलग होती हैं, इसी वजह से दुनिया में दस्तख़त के बजाय अंगूठे के निशान को इस्तेमाल किया जाता है। इन लकीरों में इतना बारीक-बारीक फ़र्क़ होता है कि अरबों-पद्मों इंसानों की उंगलियों के इस फ़र्क़ को याद रख कर फिर दोबारा वैसी ही लकीरें बना देना अल्लाह तआला के सिवा किसी और के लिए मुमकिन नहीं है। (आसान तर्जुमा क़ुरआन)
खौफ-ए-इलाही (अल्लाह का डर) भी मारिफत (पहचान) का नतीजा है!!
लेख

खौफ-ए-इलाही (अल्लाह का डर) भी मारिफत (पहचान) का नतीजा है!!

इमाम जलालुद्दीन रूमी (रह.) ने लिखा है कि एक आदमी सफर पर निकला। वह एक जंगल में चलता रहा और बहुत दूर चलने के बाद उसे भारी थकान महसूस हुई, जिसके कारण उस पर नींद हावी हो गई। उसने सोचा कि कहीं आराम कर ले; लेकिन सिर्फ इसलिए हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वह जंगल का रास्ता था। उसने सोचा, "जंगल के रास्ते में भला क...

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