ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से खुली दलील आ चुकी है, और हमने तुम्हारे पास एक ऐसी रोशनी भेज दी है जो रास्ते की पूरी वज़ाहत करने वाली है (174) (आसान तर्जुमा-उल-क़ुरआन)
मुझे याद है कि देवबंद में जब मेरी उम्र तक़रीबन दस-बारह साल थी, एक दिन फज्र की नमाज़ के वक़्त सख़्त आंधी, मूसलाधार बारिश और गरज-चमक की बिना पर (वजह से) वालिद साहब (मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब) मस्जिद तशरीफ़ न ले जा सके और नमाज़ घर में ही अदा फ़रमाई। उधर दादा अब्बा, जो मस्जिद के आशिक़ और नमाज़ बा-जमात क...