لَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَّفْسَكَ اَلَّا یَكُوْنُوْا مُؤْمِنِیْنَ(۳)اِنْ نَّشَاْ نُنَزِّلْ عَلَیْهِمْ مِّنَ السَّمَآءِ اٰیَةً فَظَلَّتْ اَعْنَاقُهُمْ لَهَا خٰضِعِیْنَ(۴)
अनुवाद
(ऐ पैगंबर) शायद तुम इस ग़म में अपनी जान हलाक किए जा रहे हो कि ये लोग ईमान (क्यों) नहीं लाते। (3) अगर हम चाहें तो इन पर आसमान से कोई ऐसी निशानी उतार दें कि इसके आगे इनकी गर्दनें झुक कर रह जाएं। (4)
मतलब: यह है कि अल्लाह तआला के लिए यह कुछ मुश्किल नहीं था कि इनको ईमान लाने पर मजबूर कर देता, लेकिन इस दुनिया में इंसान को भेजने का मक़सद यह नहीं है कि उसे ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया जाए। बल्कि इंसान से मुतालबा यह है कि वह किसी ज़ोर ज़बरदस्ती के बग़ैर अपनी अक़्ल को इस्तेमाल करके और दलीलों पर ग़ौर करके ईमान का रास्ता इख़्तियार करे। यही वह आज़माइश है जिसके लिए उसे दुनिया में भेजा गया है। इसलिए अगर ये लोग ईमान नहीं ला रहे हैं तो आपको इतना सदमा नहीं करना चाहिए कि अपनी जान को हलकान कर लें। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)