وَ اِنْ تَعُدُّوْا نِعْمَةَ اللّٰهِ لَا تُحْصُوْهَا اِنَّ اللّٰهَ لَغَفُوْرٌ رَّحِیْمٌ(۱۸)(سورۃ النحل)
अनुवाद
और अगर तुम अल्लाह की नेमतों को गिनने लगो, तो उन्हें शुमार नहीं कर सकते। हक़ीक़त यह है कि अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, बड़ा मेहरबान है। (18) (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)
यानी: अल्लाह तआला की नेमतें जब इतनी ज़्यादा हैं कि शुमार में नहीं आ सकतीं तो उनका हक़ तो यह था कि इंसान हर पल अल्लाह तआला का शुक्र ही अदा करता रहे। लेकिन अल्लाह तआला जानता है कि यह इंसान के बस में नहीं है। इसलिए वह अपनी मग़फ़िरत और रहमत का मामला फ़रमा कर शुक्र की इस कोताही को माफ़ फ़रमाता रहता है। अलबत्ता यह मुतालबा ज़रूर है कि वह उसके अहकाम के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारे और ज़ाहिर व बातिन हर एतबार से अल्लाह तआला का फ़रमांबरदार रहे। इसके लिए उसे यह हक़ीक़त नज़र के सामने रखनी चाहिए कि अल्लाह तआला उसके हर काम को जानता है। चाहे वह छुप कर करे या खुल्लम-खुल्ला। चुनांचे अगली आयत में यही हक़ीक़त बयान फ़रमाई गई है। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)