وَ اقْصِدْ فِیْ مَشْیِكَ وَ اغْضُضْ مِنْ صَوْتِكَ اِنَّ اَنْكَرَ الْاَصْوَاتِ لَصَوْتُ الْحَمِیْرِ۠(۱۹)(سورۃ لقمان)
अनुवाद
और अपनी चाल में एतदाल (मध्यम मार्ग) इख़्तियार करो और अपनी आवाज़ आहिस्ता रखो, बेशक सब से बुरी आवाज़ गधों की आवाज़ है। (19) (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)
यानी: इंसान को दरमियानी रफ़्तार से चलना चाहिए, रफ़्तार न इतनी तेज़ हो कि भागने के क़रीब पहुँच जाए और न इतनी आहिस्ता कि सुस्ती में दाख़िल हो जाए, यहाँ तक कि जब कोई शख़्स जमाअत से नमाज़ पढ़ने जा रहा हो तो उसको भी आंहज़रत ﷺ ने भागने से मना फ़रमा कर वक़ार और सुकून के साथ चलने की ताकीद फ़रमाई है।
और: आवाज़ आहिस्ता रखने से मुराद यह नहीं है कि इंसान इतना आहिस्ता बोले कि सुनने वाले को दिक़्क़त पेश आए, बल्कि मुराद यह है कि जिनको सुनाना मक़सूद है उन तक तो आवाज़ वज़ाहत के साथ पहुँच जाए, लेकिन इससे ज़्यादा चीख़-चीख़ कर बोलना इस्लामी आदाब के ख़िलाफ़ है, यहाँ तक कि कोई शख़्स दर्स दे रहा हो, या वअज़ (भाषण) कर रहा हो तो उसकी आवाज़ इतनी ही बुलंद होनी चाहिए जितनी उसके मुख़ातबों को सुनने-समझने के लिए ज़रूरत है, इससे ज़्यादा आवाज़ बढ़ाने को भी इस आयत के तहत बुज़ुर्गों ने मना फ़रमाया है, इस हुक्म पर ख़ास तौर से उन हज़रात को ग़ौर करने की ज़रूरत है जो बिला ज़रूरत स्पीकर का इस्तेमाल करके लोगों के लिए तकलीफ़ का बाइस (कारण) बनते हैं। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)