وَ لَوْ شَآءَ اللّٰهُ لَجَعَلَهُمْ اُمَّةً وَّاحِدَةً وَّ لٰكِنْ یُّدْخِلُ مَنْ یَّشَآءُ فِیْ رَحْمَتِهٖ وَ الظّٰلِمُوْنَ مَا لَهُمْ مِّنْ وَّلِیٍّ وَّ لَا نَصِیْرٍ(۸)(سورۃ الشوریٰ)
अनुवाद
और अगर अल्लाह चाहता तो उन सबको एक ही जमात (समुदाय) बना देता, लेकिन वह जिसको चाहता है, अपनी रहमत में दाख़िल करता है, और जो ज़ालिम लोग हैं उनका न कोई रखवाला है، न कोई मददगार है। (8) (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)
यानी: सबको ज़बरदस्ती मुसलमान बना देता, लेकिन इंसान को पैदा करने का असल मक़सद ही यह था कि लोग ज़बरदस्ती नहीं, बल्कि ख़ुद अपने अख़्तियार (मर्जी) से सोच-समझकर हक़ क़बूल करें। इसी में उनका इम्तिहान है जिस पर आख़िरत की जज़ा (पुण्य) और सज़ा मरत्तब होने वाली है, इसलिए अल्लाह तआला ने किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना नहीं चाहा। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)