कुरान की आयत

یٰۤاَیُّهَا الَّذِیْنَ اٰمَنُوْا لَا تَتَّخِذُوْۤا اٰبَآءَكُمْ وَ اِخْوَانَكُمْ اَوْلِیَآءَ اِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْاِیْمَانِ وَ مَنْ یَّتَوَلَّهُمْ مِّنْكُمْ فَاُولٰٓئِكَ هُمُ الظّٰلِمُوْنَ(۲۳)(سورۃ التوبہ)
अनुवाद
ऐ ईमान वालो! अगर तुम्हारे बाप भाई कुफ़्र को ईमान के मुक़ाबले में तरजीह (प्राथमिकता) दें तो उनको अपना सरपरस्त (संरक्षक) न बनाओ। और जो लोग उनको सरपरस्त बनाएंगे वह ज़ालिम होंगे। (23) (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन) यानी: इसका मतलब यह है कि उनसे ऐसे ताल्लुक़ात (सम्बन्ध) न रखो जो तुम्हारे लिए दीनी फ़राइज़ (धार्मिक कर्तव्यों) की अदायगी में रुकावट बन जाएं, जहाँ तक अपने ईमान और दीनी फ़राइज़ का तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा) करते हुए उनके साथ हुस्न-ए-सुलूक (अच्छा व्यवहार) का ताल्लुक़ है, उसको क़ुरआन करीम ने मुस्तहसन (सराहनीय) क़रार दिया है। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)
परहेज़गार उस्ताद और समझदार शागिर्द
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परहेज़गार उस्ताद और समझदार शागिर्द

हज़रत हकीमुल उम्मत थानवी और हज़रत शाह वसीउल्लाह इलाहाबादी (नूरुल्लाह मरक़दहुमा) दोनों ने यह वाक़िया नक़्ल किया कि एक परहेज़गार आलिम बच्चों को पढ़ाते थे। एक दिन उनके घर में फ़क्र व फ़ाक़ा (ग़रीबी और भुखमरी) था, भूख की शिद्दत (तीव्रता) से उनका चेहरा मुरझाया हुआ था। जो तलबा (छात्र) पढ़ने आते थे, उनमें...

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