یٰۤاَیُّهَا الَّذِیْنَ اٰمَنُوْا لَا تَتَّخِذُوْۤا اٰبَآءَكُمْ وَ اِخْوَانَكُمْ اَوْلِیَآءَ اِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْاِیْمَانِ وَ مَنْ یَّتَوَلَّهُمْ مِّنْكُمْ فَاُولٰٓئِكَ هُمُ الظّٰلِمُوْنَ(۲۳)(سورۃ التوبہ)
अनुवाद
ऐ ईमान वालो! अगर तुम्हारे बाप भाई कुफ़्र को ईमान के मुक़ाबले में तरजीह (प्राथमिकता) दें तो उनको अपना सरपरस्त (संरक्षक) न बनाओ। और जो लोग उनको सरपरस्त बनाएंगे वह ज़ालिम होंगे। (23) (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)
यानी: इसका मतलब यह है कि उनसे ऐसे ताल्लुक़ात (सम्बन्ध) न रखो जो तुम्हारे लिए दीनी फ़राइज़ (धार्मिक कर्तव्यों) की अदायगी में रुकावट बन जाएं, जहाँ तक अपने ईमान और दीनी फ़राइज़ का तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा) करते हुए उनके साथ हुस्न-ए-सुलूक (अच्छा व्यवहार) का ताल्लुक़ है, उसको क़ुरआन करीम ने मुस्तहसन (सराहनीय) क़रार दिया है। (आसान तर्जुमतुल क़ुरआन)