मुंबई में आतंकी खतरा: आरोपी गिरफ्तार, गोदी मीडिया और हिंदुत्ववादी पार्टियों का दुष्प्रचार। धमकी देने वाला आरोपी गिरफ्तार। भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई एक बार फिर आतंकी खतरे से हिल गई। लेकिन मुंबई पुलिस की सतर्क कार्रवाई ने इस खतरे के पीछे के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया। क्राइम ब्रांच ने बिहार निवासी 50 वर्षीय अश्विन कुमार सुप्रा को नोएडा से गिरफ्तार किया है। उसने मुंबई ट्रैफिक पुलिस के व्हाट्सएप नंबर पर धमकी भरा संदेश भेजा था, जिसमें उसने 400 किलो आरडीएक्स और 34 आत्मघाती हमलावरों से शहर को तबाह करने की बात कही थी। संदेश में लश्कर-ए-जिहाद नामक संगठन का जिक्र था और अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन के मौके पर बम धमाके करने की धमकी दी गई थी। मुंबई पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी के फोन कॉल और लोकेशन का पता लगाया और उसे नोएडा से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी के फोन और सिम कार्ड भी बरामद कर लिए गए हैं और उसे आगे की जांच के लिए मुंबई लाया जा रहा है। पुलिस ने शहर में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी है और ताज होटल, हवाई अड्डे और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया है। अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन के लिए 21,000 से अधिक पुलिसकर्मी और 150 अधिकारी तैनात किए गए थे, जबकि एआई के माध्यम से यातायात और मार्गों की निगरानी की जा रही थी। गोदी मीडिया और हिंदुत्ववादी दलों द्वारा संभावित दुष्प्रचार: यदि धमकी देने वाला संदिग्ध मुस्लिम होता, तो गोदी मीडिया और हिंदुत्ववादी दल इस घटना का इस्तेमाल इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार के हथियार के रूप में करते। हमेशा की तरह, बिना किसी ठोस सबूत के, मीडिया चैनलों और सोशल मीडिया पर यह शोर मच गया कि "आतंकवाद का संबंध इस्लाम से है"। दिन-रात सुर्खियां छपती रहीं, जिनमें बिना किसी शोध के मुसलमानों को दोषी ठहराया गया। हिंदुत्ववादी संगठनों ने इस अवसर का लाभ उठाकर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया, उनके खिलाफ नफरत भरे भाषण दिए और सोशल मीडिया पर झूठी अफवाहों का तूफान खड़ा कर दिया। अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां निर्दोष मुसलमानों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में वर्षों तक जेल में रखा गया, उनका जीवन बर्बाद हो गया और अंततः अदालतों ने उन्हें निर्दोष घोषित कर रिहा कर दिया। लेकिन तब तक उन्हें सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से जो नुकसान हुआ था, वह अपूरणीय था। मुआवजा दिया जा चुका है। दूसरी ओर, जब आरोपी गैर-मुस्लिम निकलता है, जैसा कि अश्विन कुमार सुप्रा के मामले में हुआ, तो मीडिया और हिंदुत्ववादी दल चुप रहते हैं। न तो कोई विरोध होता है, न ही इसे कोई धार्मिक रंग दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड हर बार स्पष्ट होता है, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया इस पर चर्चा करने से बचता है। नतीजा यह है कि यह घटना एक बार फिर इस तथ्य को उजागर करती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य से, हर धमकी या घटना को किसी विशेष समुदाय से जोड़ने की कोशिश की जाती है, जो न केवल न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि समाज में नफरत और विभाजन को भी बढ़ावा देता है। मुंबई पुलिस की इस त्वरित कार्रवाई की चाहे जितनी भी प्रशंसा की जाए, यह आवश्यक है कि मीडिया और राजनीतिक दल अपने पूर्वाग्रहों को त्यागकर प्रत्येक मामले को निष्पक्ष रूप से देखें। संदर्भ: हिंदुस्तान टाइम्स, इंडिया टुडे, एनडीटीवी, टाइम्स ऑफ इंडिया, मनी कंट्रोल, एक्स पोस्ट