New Manqabat Umar (R.A) 2026 | Umar Ko Dekha | Khaleel Brothers

इसे शेयर करें:
WhatsApp Facebook

ارے بھائی!

اگر آپ ہزاروں کتابیں، نعتیں، تصاویر، ویڈیوز، اخبار، مضامین، قبلہ نما، اوقات نماز، اسلامک گھڑی اور بہت کچھ آسانی کے ساتھ حاصل کرنا چاہتے ہیں تو بس ہمارے Islamic Tube ایپ کو پلے سٹور سے انسٹال کرو، اور بالکل مفت اور آسانی کے ساتھ اسلامک مواد حاصل کرو

ڈاؤن لوڈ کریں

Naats

कुत्तों के लिए कुर्बानी न कीजिए खुदारा...!! (ईद-उल-अज़हा की एक झकझोर देने वाली कहानी)

कुत्तों के लिए कुर्बानी न कीजिए खुदारा...!! (ईद-उल-अज़हा की एक झकझोर देने वाली कहानी)

यह घटना एक मध्यमवर्गीय परिवार से जुड़ी है। एक पिता की दास्तान सुनिए जो कुर्बानी करने में असमर्थ है। "बाबा.... बाबा .... हमें भी गोश्त मिलेगा ना?" मैंने कहा: "हाँ-हाँ, क्यों नहीं, बिल्कुल मिलेगा।" "लेकिन बाबा ....पिछली ईद पर तो किसी ने भी हमें गोश्त नहीं दिया था, अब तो पूरा साल हो गया है गोश्त देखे हुए भी..." मैंने बड़े प्यार से समझाया: "बेटा, अल्लाह ने हमें भूखा तो नहीं रखा। मेरी प्यारी बेटी, हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए।" मेरी बेटी फिर बोलने लगी, "साथ वाले अंकल कुर्बानी के लिए बड़ा जानवर लेकर आए हैं, और सामने वाले चाचा इकबाल भी तो बकरा लेकर आए हैं।" मैं दिल में सोच रहा था कि हम गरीबों के लिए ही तो कुर्बानी का गोश्त होता है, अमीर लोग तो सारा साल गोश्त ही खाते हैं। यही सोचते हुए मैं ईद की नमाज़ के लिए मस्जिद की तरफ चल पड़ा। वहाँ भी मौलवी साहब बयान (प्रवचन) फरमा रहे थे कि कुर्बानी में गरीब और मिस्कीन (لاچار) लोगों को नहीं भूलना चाहिए... उनके बहुत अधिकार होते हैं। खैर, मैं भी नमाज़ अदा करके घर पहुँच गया। कोई एक घंटे तक इंतज़ार करने के बाद मेरी बेटी बोली, "बाबा, अभी तक गोश्त नहीं आया।" बड़ी बहन राफिया बोली, "चुप हो जाओ शाज़ी, बाबा को तंग मत करो।" मैं चुपचाप दोनों की बातें सुनता रहा और नज़रअंदाज़ करता रहा। काफी देर के बाद भी जब कहीं से गोश्त नहीं आया तो शाज़िया की माँ बोली, "सुनिए, मैंने तो प्याज-टमाटर भी काट दिए हैं, लेकिन कहीं से भी गोश्त नहीं आया। कहीं वे हमारी तरफ गोश्त भेजना भूल तो नहीं गए? आप खुद जाकर मांग लाएं।" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा कि यह क्या अजीब बात कर रही है। मैंने नरमी से कहा, "देखो शाज़िया की माँ.... तुम्हें तो पता है आज तक हमने कभी किसी से मांगा नहीं है, अल्लाह कोई न कोई सबब (रास्ता) पैदा करेगा।" दोपहर गुज़रने के बाद शाज़िया के बार-बार ज़िद करने पर पहले दूसरी गली में एक जानने वाले डॉक्टर साहब के घर गए। बेटी का मायूसी से भरा चेहरा बर्दाश्त नहीं हो रहा था, इसलिए मजबूरी में उसे साथ लेकर चल पड़ा। डॉक्टर साहब दरवाज़े पर आए तो मैं बोला, "डॉक्टर साहब, मैं आपका पड़ोसी हूँ, क्या कुर्बानी का गोश्त मिल सकता है?" यह सुनना था कि डॉक्टर साहब का रंग लाल-पीला होने लगा और हिकारत (नफ़रत) से बोले, "पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं गोश्त माँगने!" और धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर दिया। अपमान के अहसास से मेरी आँखों में आँसू आ गए। लेकिन बेटी का दिल न दुखे, इसलिए मैं आँसुओं को ज़बरदस्ती पलकों में रोकने की कोशिश करने लगा। आखिरी उम्मीद चाचा इकबाल थे। भारी कदमों से चल पड़ा। उनके सामने भी बेटी की खातिर गोश्त के लिए हाथ फैलाया। चाचा इकबाल ने गोश्त का सुनकर अजीब सी नज़रों से देखा और चले गए। थोड़ी देर बाद बाहर आए तो शापर (थैली) देकर जल्दी से अंदर चले गए, जैसे मैंने गोश्त मांगकर कोई गुनाह कर दिया हो। घर पहुँचकर देखा तो उसमें सिर्फ हड्डियाँ और चर्बी थी। मैं खामोशी से उठकर कमरे में चला आया और बेआवाज़ आँसू बहते जा रहे थे। बीवी आई और बोली, "कोई बात नहीं, आप दुखी न हों। मैं चटनी बना लेती हूँ।" थौड़ी देर बाद शाज़िया कमरे में आई और बोली, "बाबा, हमें गोश्त नहीं खाना है, मेरे पेट में दर्द हो रहा है।" लेकिन मैं समझ गया कि बेटी बाप को दिलासा दे रही है। बस यह सुनना था कि मेरी आँखों से आँसू गिरने लगे और फिर मैं फूट-फूट कर रोने लगा। लेकिन रोने वाला मैं अकेला नहीं था, दोनों बच्चियाँ और बीवी भी आँसू बहा रही थीं। इतने में पड़ोस वाले अकरम की आवाज़ आई, जो सब्ज़ी का ठेला लगाता था। "आज़ाद भाई, दरवाज़ा खोलो!" दरवाज़ा खोला तो अकरम ने तीन-चार किलो गोश्त का शापर थमा दिया और बोला, "गाँव से छोटा भाई लाया है। इतना हम अकेले नहीं खा सकते, यह तुम भी खा लेना।" खुशी और कृतज्ञता (शुक्रगुज़ारी) के अहसास से आँखों में आँसू आ गए और अकरम के लिए दिल से दुआ निकलने लगी। गोश्त खाकर अभी फारिग (फ्री) हुए ही थे कि बहुत ज़ोर का तूफान आया। बारिश शुरू हो गई और उसके साथ ही बिजली चली गई। दूसरे दिन भी बिजली नहीं आई, पता किया तो मालूम हुआ कि ट्रांसफार्मर जल गया है। तीसरे दिन मेरी बेटी शाज़िया और मैं बाहर आए तो देखा कि, चाचा इकबाल और डॉक्टर साहब बहुत सा गोश्त बाहर फेंक रहे थे, जो बिजली न होने की वजह से खराब हो चुका था और उस पर कुत्ते झपट रहे थे। शाज़िया बोली, "बाबा! क्या कुत्तों के लिए कुर्बानी की थी?" वे शाज़िया का चेहरा देखते रह गए। चाचा इकबाल और डॉक्टर साहब ने यह सुनकर अपनी गर्दनें झुका लीं। यह सिर्फ एक लेख ही नहीं है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में कुर्बानी के मौके पर आँखों देखा हाल है। खुदा के लिए अपने आस-पास रहने वाले गरीब और मिस्कीन लोगों का अहसास करें। (منقول - साभार नकल) चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो।