ماہنامہ ندائے اعتدال علیگڑھ (ستمبر)

ماہنامہ ندائے اعتدال علیگڑھ (ستمبر)

इस पुस्तक को एक क्लिक के साथ देखें। ऑनलाइन पढ़ें या ऑफलाइन पढ़ने के लिए डाउनलोड करें।

ارے بھائی!

اگر آپ ہزاروں کتابیں، نعتیں، تصاویر، ویڈیوز، اخبار، مضامین، قبلہ نما، اوقات نماز، اسلامک گھڑی اور بہت کچھ آسانی کے ساتھ حاصل کرنا چاہتے ہیں تو بس ہمارے Islamic Tube ایپ کو پلے سٹور سے انسٹال کرو، اور بالکل مفت اور آسانی کے ساتھ اسلامک مواد حاصل کرو

ڈاؤن لوڈ کریں

हज़रत अबू क़िलाबा के सब्र व शुक्र की मर्क़ूम कहानी

हज़रत अबू क़िलाबा के सब्र व शुक्र की मर्क़ूम कहानी

हज़रत अबू क़िलाबा रहमतुल्लाह अलैह एक जलील-उल-क़द्र (उच्च कोटि के) ताबेई और बहुत बड़े मुहद्दिस (हदीस के विद्वान) हैं। वह हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु के शागिर्द हैं। आप बसरा में रहते थे और अपने ज़माने के अत्यंत साबिर व शाकिर (धैर्यवान और कृतज्ञ) इंसान थे। इतिहास में आपके सब्र व शुक्र की एक घटना मिलती है जो अत्यंत सबक़आमोज़ (शिक्षाप्रद) और इबरतअंगेज़ (आँखें खोलने वाली) है: अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद कहते हैं कि मैं जिहादी मुहिम के सिलसिले में मिस्र के एक तटीय इलाक़े में ठहरा हुआ था। एक बार मैं समुद्र तट की ओर निकल गया, वहाँ मैदान में एक ख़ीमा (तंबू) नज़र आया। ख़ीमे में एक व्यक्ति दिखाई दिया जो हाथ-पैरों से अपंग था और कम सुनने तथा कम देखने (कमज़ोर दृष्टि) का शिकार था। उसकी ज़ुबान के अलावा उसका कोई भी अंग काम के लायक़ नहीं था, जो सलामत थी और वह ज़ुबान से यह कह रहा था: "اللَّهُمَّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَحْمَدَكَ حَمدًا أكَافِيُّ بِهِ شُكُرَ نِعْمَتِكَ الَّتِي أَنْعَمْتَ بِهَا عَلَى وَفَضلنِي عَلَى كَثِيرٍ مِّمَّنْ خَلَقَ تَفْضِيلاً " यानी 'ए अल्लाह! मुझे तौफ़ीक़ (क्षमता) दे कि मैं तेरी वैसी हम्द व थना (प्रशंसा) कर सकूँ जिससे तेरी उन नेमतों का शुक्र अदा हो सके जो तूने मुझ पर की हैं, और तूने मुझे अपनी मख़्लूक़ (सृष्टि) में से बहुतों पर फ़ज़ीलत और श्रेष्ठता बख़्शी है।' अब्दुल्लाह कहते हैं कि मेरे मन में आया कि चलकर इन साहब से इस दुआ के बारे में पूछना चाहिए। चुनाँचे मैं उनके पास आया और उन्हें सलाम करके मैंने उनसे दरयाफ़्त (पूछा) किया कि मैंने आपको यह दुआ करते सुना है (जबकि आपकी स्थिति यह है कि आप हाथ-पैरों से अपंग हैं और कम सुनने व कमज़ोर रोशनी का शिकार हैं), आप अल्लाह की कौन सी नेमत पर हम्द व थना कर रहे हैं और ऐसी कौन सी फ़ज़ीलत आपको हासिल है जिसका आप शुक्र अदा करना चाहते हैं? उन साहब ने कहा: तुम्हें क्या मालूम कि मेरे रब का मेरे साथ क्या मामला है? अगर वह आसमान से आग बरसाकर मुझे भस्म (राख) कर दे, पहाड़ों को हुक्म देकर मुझे कुचलवा दे, समंदरों को कहकर मुझे ग़र्क़ (डुबो) कर दे, ज़मीन को मुझे निगलने का हुक्म दे दे, तो मैं क्या कर सकता हूँ? मेरे पास अल्लाह की एक बड़ी नेमत मेरी यह ज़ुबान है, मुझसे इसका भी पूरी तरह शुक्रिया अदा नहीं हो सकता। तुम मेरी हालत देख रहे हो, मैं अपना कोई काम ख़ुद नहीं कर सकता। मेरा एक बेटा है, जो नमाज़ के वक़्त मेरा ख़्याल रखता है, वही मुझे वज़ू करवाता है और वही मेरे खाने-पीने का इंतज़ाम करता है। तीन दिन से वह ग़ायब है, अगर तुम उसे तलाश कर दो तो बड़ी मेहरबानी होगी। मैंने कहा कि आप जैसे इंसान की ख़िदमत से बढ़कर और क्या सआदत (सौभाग्य) हो सकती है? मैं यह कहकर बच्चे की तलाश में निकल पड़ा। अभी मैं थोड़ी दूर ही गया था कि रेत के टीलों के बीच बच्चे की लाश पड़ी हुई मिली, जिसे किसी दरंदे (जंगली जानवर) ने चीर-फाड़ कर मार डाला था। मैंने 'इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन' पढ़ा और दिल में सोचने लगा कि मैं इस बच्चे के बाप को जाकर कैसे बताऊँ? आख़िरकार मैं गया और हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के सब्र का ज़िक्र करके मैंने उन्हें बताया कि जिस बच्चे की तलाश में आपने मुझे भेजा था, उसे तो किसी दरंदे ने चीर-फाड़ कर हलाक (मार) कर दिया है। उन साहब ने यह ख़ौफ़नाक ख़बर सुनकर कहा: "الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَخْلُق مِنْ ذُرِّيَّتِي خَلَفًا يَعْصِيهِ فَيُعَذِّبُهُ بِالنَّارِ" यानी 'अल्लाह का शुक्र है जिसने मेरी औलाद को नाफ़रमान पैदा नहीं किया जो दोज़ख़ (नरक) के अज़ाब का शिकार होती।' फिर उन साहब ने 'इन्ना लिल्लाहि...' पढ़ा और ज़ोर की एक आह भरकर वफ़ात पा गए (चल बसे)। मेरे लिए यह बहुत बड़ी समस्या बन गई कि अगर इन्हें यूँ ही छोड़कर जाता हूँ तो डर है कि कहीं इन्हें दरंदे न खा जाएँ, और अगर यहाँ ठहरता हूँ तो क्या करूँ, अकेला मुझसे कुछ हो नहीं सकता। बहरहाल, मैंने उनके शव को चादर से ढँका और उनके सिरहाने बैठकर रोने लगा। मैं बैठा हुआ था कि अचानक चार आदमी आए और कहने लगे, "अब्दुल्लाह! क्या हुआ?" मैंने उन्हें सारा क़िस्सा सुनाया। वे कहने लगे, "इनका चेहरा तो खोलो, हो सकता है हम इन्हें जानते ही हों।" मैंने चेहरा खोला तो वे लोग उन पर टूट पड़े; कभी आँखों को चूमते और कभी हाथों को बोसा (चुंबन) देते और साथ-साथ कहते जाते: "हम इन आँखों पर क़ुर्बान जो अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों के सामने हमेशा बंद रहीं, हम इस जिस्म पर क़ुर्बान जो हमेशा लोगों के सोने के वक़्त भी सजदा रेज़ रहता (सजदे में रहता) था।" मैंने कहा कि बताओ तो सही ये कौन साहब हैं? वे बोले, "ये हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास के शागिर्द हज़रत अबू क़िलाबा अल-जर्मी हैं। ये ख़ुदा और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले इंसान थे।" हमने उन्हें ग़ुस्ल दिया और जो कपड़े हमारे पास थे उनमें उन्हें कफ़नाया, उनका जनाज़ा पढ़ा और दफ़्न कर दिया। वे लोग वापस चले गए और मैं भी अपनी जगह चला आया। रात को सोया तो ख़्वाब (सपने) में देखा कि आप जन्नत के बाग़ों में सैर कर रहे हैं और जन्नत वासियों का लिबास पहने हुए हैं और यह आयत तिलावत फ़रमा रहे हैं: "سَلَامٌ عَلَيْكُمْ بِمَا صَبَرتم فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِ" (तुम पर सलामती हो तुम्हारे सब्र करने के कारण, और आख़िरत का घर बेहतरीन ठिकाना है)। मैंने ख़्वाब ही में उनसे पूछा कि क्या आप मेरे वही अपंग दोस्त नहीं हैं? उन्होंने फ़रमाया कि हाँ मैं वही हूँ। मैंने दरयाफ़्त किया कि आपको यह मक़ाम व मर्तबा (स्थान व प्रतिष्ठा) कैसे हासिल हुआ? उन्होंने जवाब दिया कि अल्लाह के यहाँ कुछ दरजात ऐसे हैं जिन तक रसाई (पहुँच) मुसीबत में सब्र, राहत व आराम में शुक्र और तन्हाई व महफ़िल में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा (अल्लाह के डर) के बिना मुमकिन नहीं है। ग़ौर किया आपने कि ये कैसे साबिर व शाकिर इंसान थे?

सबसे हालिया