التفسیر المظھری الجزء الرابع

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पवित्र लकड़हारे का चमत्कार और ईमान का नूर

पवित्र लकड़हारे का चमत्कार और ईमान का नूर

हज़रत दाऊद बिन रशीद (रह.) फ़रमाते हैं: मुल्क-ए-शाम (सीरिया) में दो हसीन-ओ-जमील इबादतगुज़ार नौजवान रहते थे। कसरत-ए-इबादत (अधिक इबादत) और तक़्वा व परहेज़गारी की वजह से उन्हें 'सबीह' और 'मलीह' के नाम से पुकारा जाता था। उन्होंने अपना एक वाक़िया कुछ यूं बयान किया: एक मर्तबा हमें भूख ने बहुत ज़्यादा तंग किया। मैंने अपने रफ़ीक़ (साथी) से कहा, 'आओ, फ़लां सहरा (रेगिस्तान) में चलकर किसी शख़्स को दीने-मतीन (सच्चे दीन) के कुछ अहकाम सिखाकर अपनी आख़िरत की बेहतरी के लिए कुछ इक़दाम (प्रयास) करें।' चुनांचे, हम दोनों सहरा की जानिब चल पड़े। वहाँ हमें एक स्याह-फ़ाम (काले रंग का) शख़्स मिला जिसके सर पर लकड़ियों का गट्ठा था। हमने उससे कहा, 'बताओ! तुम्हारा रब कौन है?' यह सुनकर उसने लकड़ियों का गट्ठा ज़मीन पर फेंका और उस पर बैठकर कहा, 'मुझसे यह न पूछो कि तेरा रब कौन है? बल्कि यह पूछो कि ईमान तेरे दिल के किस गोशे (कोने) में है?' इस देहाती का आरिफ़ाना (आध्यात्मिक) कलाम सुनकर हम दोनों हैरत से एक दूसरे का मुंह तकने लगे। वह फिर मुख़ातिब हुआ, 'तुम ख़ामोश क्यों हो गए? मुझसे पूछो, सवाल करो, बेशक तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी) सवाल करने से बाज़ नहीं रहता।' हम उसकी बातों का कुछ जवाब न दे सके और ख़ामोश रहे। जब उसने हमारी ख़ामोशी देखी तो बारगाह-ए-ख़ुदावंदी में इस तरह अर्ज़गुज़ार हुआ: 'ऐ मेरे पाक परवरदिगार! तू ख़ूब जानता है कि तेरे कुछ ऐसे बंदे भी हैं कि जब वो तुझ से सवाल करते हैं तो तू उन्हें ज़रूर अता फ़रमाता है। मेरे मौला! मेरी इन लकड़ियों को सोना बना दे।' अभी उसने यह अलफ़ाज़ अदा ही किए थे कि सारी लकड़ियाँ चमकदार सोना बन गईं। उसने फिर दुआ की, 'ऐ मेरे परवरदिगार! बेशक तू अपने उन बंदों को ज़्यादा पसंद फ़रमाता है जो शोहरत के तालिब (इच्छुक) नहीं होते। मेरे मौला! इस सोने को दोबारा लकड़ियाँ बना दे।' उसका कलाम ख़त्म होते ही वह सारा सोना दोबारा लकड़ियों में तब्दील हो गया। उसने लकड़ियों का गट्ठा अपने सर पर रखा और एक जानिब रवाना हो गया। हम अपनी जगह साकित-ओ-जामिद (स्थिर) खड़े रहे और किसी को उसके पीछे जाने की जुर्रत न हुई। अल्लाह सुब्हानहू व तआला के इस नेक बंदे का ज़ाहिरी रंग अगरचे स्याह (काला) था, लेकिन उसका बातिन (अंतर्मन) नूर-ए-मअरेफ़त और ईमान से मुनव्वर व रौशन था। उयूनुल हिकायात, इब्न अल-जौज़ी, अनुवादक: 2/246 से 247 ____________📝📝____________ मनक़ूल (उद्धृत)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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